Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
6 Sep 2025 · 1 min read

बरस रही बरसात

** गीतिका **
~~~~
नित्य बहुत ही देखिए, बरस रही बरसात।
काबू में आते नहीं, बिगड़ रहे हालात।

नदियां नालों का हुआ, रूप बहुत विकराल।
पानी का जब स्तर बढ़ा, बिगड़ रही हर बात।

हरे भरे सब हो गये, घाटी और पहाड़।
मिट्टी बहती जा रही, सभी जगह दिन रात।

डूब गये हैं बाढ़ में, खेत सभी खलिहान।
रोजी रोटी छिन गई, भीषण यह आघात।

बर्बादी के सामने, मानव है असहाय।
कुदरत के इस कहर से, रोज खा रहा मात।

आपस में मिल बैठकर, कर लें सभी विचार।
संघर्षों में अब हमें, कैसे मिले निजात।

बिल्कुल भी अच्छा नहीं, प्रकृति से टकराव।
इसका संरक्षण करें, माता यह साक्षात।
~~~~
-सुरेन्द्रपाल वैद्य

Loading...