भज गोविंदा, भज गोपाला…
भज गोविंदा, भज गोपाला…
शर्म से कर ली आंखें बंद
और कुछ न किया सवाल
उघडा -उघडा देखा बदन
तो मन में उठा खयाल
क्या
ये बाला है या कोई ज्वाला
या नशे की बोतल में कोई हाला
दिल घबराया बोल उठा फिर
भज गोविंदा, भज गोपाला…
नये युग में नर-नारी का
भेद समझ न आये
एक ने लम्बे बाल किये
एक मुँह ढक के मुस्काए
चिपक बाईक पर बैठे देखा
तो मन में उठा खयाल
क्या
भज गोविंदा, भज गोपाला
भज गोविंदा, भज गोपाला…
दुनिया की तो ऐसी तैसी
है ये जमाना अपना
गुजरे कल को मुशिकल है
अर्थ नये पल का समझाना
पहन जींस मटकाई कमर
और हिला दिया रुमाल
देखा ऐसा दृश्य सड़क पर
तो मन में आया ख्याल
क्या
भज गोविंदा, भज गोपाला
भज गोविंदा, भज गोपाला…..
मन्दिर – मस्जिद – गुरुद्वारों में
भक्ति का क्या कहना
सिर से आंचल गिरा के पहना
बेशर्मी का गहना
लोगों की नजरों से छुप कर
नैनों से बतियाना
प्रभु दरबार में देख के ऐसा
फिर मन में आया खयाल
क्या
भज गोविंदा, भज गोपाला
भज गोविंदा, भज गोपाला…
सुशील सरना