ग़ज़ल 221 1221 1221 122
ग़ज़ल 221 1221 1221 122
हमने कभी भी इश्क़ का अंबर नहीं देखा,
महबूबा के किरदार के अंदर नहीं देखा।
जो मुल्क के परचम को बचाने न खड़ा हो,
वैसा कोई इस दुनिया मेँ कायर नहीं देखा।
मुझको किसी की आंखों का कुछ ऐसा नशा है,
मैंने कभी मयख़ाना या साग़र नहीं देखा।
वो दिल से मदद करता है औरों की, कभी भी,
उस बंदे ने कभी अपना मुकद्दर नहीं देखा।
कुछ कश्तियां बस इश्क़ की साहिल पे बंधी हैं ,
साहिल के ग़ुलामों ने समंदर नहीं देखा।
हर क़ौम यहाँ मिल के रहे, इतना भी सुन्दर
दुनिया के किसी देश को सुन्दर नहीं देखा।
उनकी खुशी औ दर्द का अंदाजा नहीं है,
हाँ रूबरू हमने कभी बस्तर नहीं देखा।
( डॉ संजय दानी दुर्ग सर्वाधिकार सुरक्षित )