मैं दुनिया से बहुत उकता रहा हूं
मैं दुनिया से बहुत उकता रहा हूं
मैं खुद में ही सिमटता जा रहा हूं
जमाने ने मुझे हरदम संभाला
मैं अपने आप ठोकर खा रहा हूं
न जाने कितने दिल तोड़े हैं मैंने
उन्हीं कर्मों का फल तो पा रहा हूं
मसाइल को मैं सुलझाता हूं जितना
मैं उतना ही उलझता जा रहा हूं
नजूमी हूं मुझे फ्यूचर पता है
मै शायद इस लिए घबरा रहा हूं
सितारे चाँद को मिस कर रहे हैं
तेरी ज़ुल्फें हटाने जा रहा हूं
सफर से हो गई है आशनाई
मैं मंजिल को भी अब ठुकरा रहा हूं
चलो उनकी गज़ल में ढूँढे कमियाँ
मैं फिर चश्मा लगा के आ रहा हूं