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5 Sep 2025 · 1 min read

मैं दुनिया से बहुत उकता रहा हूं

मैं दुनिया से बहुत उकता रहा हूं
मैं खुद में ही सिमटता जा रहा हूं

जमाने ने मुझे हरदम संभाला
मैं अपने आप ठोकर खा रहा हूं

न जाने कितने दिल तोड़े हैं मैंने
उन्हीं कर्मों का फल तो पा रहा हूं

मसाइल को मैं सुलझाता हूं जितना
मैं उतना ही उलझता जा रहा हूं

नजूमी हूं मुझे फ्यूचर पता है
मै शायद इस लिए घबरा रहा हूं

सितारे चाँद को मिस कर रहे हैं
तेरी ज़ुल्फें हटाने जा रहा हूं

सफर से हो गई है आशनाई
मैं मंजिल को भी अब ठुकरा रहा हूं

चलो उनकी गज़ल में ढूँढे कमियाँ
मैं फिर चश्मा लगा के आ रहा हूं

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