भिर्री या नून खेल
///// मस्तूरी : एक संस्मरण /////
भिर्री के खेल को नून या नूनचरा खेल भी कहा जाता था। यह परम्परागत आंचलिक खेल था। यह खेल शारीरिक शौष्ठव और स्फूर्ति के लिए बहुत उपयोगी था। इसमें दो टीमें होती थी। प्रत्येक टीम में तीन या चार खिलाड़ी होते थे। इसमें जमीन में पैर से चौड़ी लकीर खींचकर लगभग 8 x 8 फीट आकार का खिलाड़ियों की संख्या के समानुपातिक घर बनाये जाते थे। पहले कौन खेलेगा? इसका निर्णय टॉस यानी चिट- पट द्वारा किया जाता था।
इस खेल में छह या आठ घरों में से एक घर को नमक घर मान लिया जाता था। खेलने वाली टीम के सदस्यों को जीतने के लिए धूल रूपी नून लेकर अपने सभी सदस्यों को बाँटना होता था। बशर्तें कि विरोधी टीम के किसी सदस्य द्वारा वह खिलाड़ी अनछुए रहें।
खेल के आरम्भ में प्रथम टीम के सभी सदस्य अलग-अलग घरों (खानों) में खड़े होते थे। दूसरी टीम के लोग क्षेत्र रक्षण करने हेतु खानों की आन्तरिक बाउण्ड्री लाइनों में मुस्तैदी से खड़े रहते थे और एक सदस्य खड़ी बाउण्ड्री लाइन में दौड़ कर या तेज चल कर जोर से भिर्री.. ई..ई की आवाज लगाता था और फिर खेल शुरू हो जाता था।
भिर्री के खेल को किशोर और किशोरियाँ दोनों ही अपने-अपने वर्ग में खेल सकते थे। अब इस खेल को खेलते हुए कहीं कोई दिखते नहीं। यानी यह खेल लगभग विलुप्तप्राय हो चुका है। जबकि इस खेल को धूल- धूसरित होकर हम बहुत खेले थे। तुम्हें सैल्यूट है भिर्री खेल।
डॉ. किशन टण्डन क्रान्ति
साहित्य वाचस्पति
भारत भूषण सम्मान प्राप्त
हरफनमौला साहित्य लेखक।