बिना आहट
मुक्तक
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बिना आहट किए जब वक्त धीरे से गुज़रता है।
सुबह की लालिमा लेकर नया सूरज निकलता है।
तमस कैसे कटा यह भूल जाते हैं सभी देखो।
नयी उम्मीद लेकर मन सहज होकर निखरता है।
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बहुत है बोझ कार्यों का हटाते भी नहीं बनता।
थके को नींद से जल्दी जगाते भी नहीं बनता।
करें क्या साथ देने से मना तुम कर चुके लेकिन।
यहां साथी नये फिर से बनाते भी नहीं बनता।
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सभी अपने नहीं होते कहां सब साथ चल पाते।
मगर हमदर्द बनते स्नेह झूठा खूब दिखलाते।
हमें अपने ही दम पर लक्ष्य हासिल आज करना है।
निकलना है ज़माने में स्वयं हर हाल मुस्काते।
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-सुरेन्द्रपाल वैद्य, मण्डी (हि.प्र.)