किन्नर की वेदना, हमारी संवेदना (डॉ. सुनील चौरसिया 'सावन' का किन्नर साहित्य)
मैंने किन्नर समुदाय की ज़िन्दगी को करीब से परखने की कोशिश की है। उनके प्रति मेरी दृष्टि अनुसंधानपरक रही है। मैंने उनका साक्षात्कार लिया है जिसे आप हमारे यूट्यूब चैनल Dr. Sunil Chaurasia’Sawan’ के माध्यम से भी देख सकते हैं। उनकी उपेक्षित ज़िन्दगी बहुत ही त्रासदीपूर्ण होती है। हमें उनकी भावनाओं का कद्र करना चाहिए। जिस तरह से हम पुरुष हैं, इसमें हमारी कोई भूमिका नहीं है या हम स्त्री हैं, इसमें हमारा कोई योगदान नहीं है। ठीक वैसे ही उनके किन्नर होने में उनका कोई गुनाह नहीं है। हम सब प्रकृति प्रदत्त उपहार हैं। प्रकृति ने उन्हें न घर का छोड़ा है न घाट का। हम सब में इतनी मानवता अवश्य होनी चाहिए कि हम किन्नर को सहर्ष स्वीकारें और अपनी पंक्ति में बिठाकर उनकी ज़िन्दगी को संवारें। जिस तरह स्त्री और पुरुष का स्वभाव एक दूजे से भिन्न होता है वैसे ही किन्नर का स्वभाव हमसे भिन्न होता है। यह प्राकृतिक गुण है जिस पर हमारा और आपका बस नहीं है। उपेक्षित ज़िन्दगी चिड़चिड़ा जाती है। उसकी गाली और ताली की पीड़ा को महसूस करने की जरूरत है। किन्नर भी इंसान हैं। उनसे मुंह मोड़ना मानवता नहीं है। उनके पास भी मन है, जिसे मान चाहिए। उनके पास भी भाव है, जिसे सम्मान चाहिए। उनके श्रृंगार में अंगार है और व्यवहार में तकरार है क्योंकि उनकी ज़िन्दगी की परिभाषा को कोई समझने की कोशिश ही नहीं करता है। ‘हमारा अपना समाज है और किन्नर का अपना समाज है’ यह अवधारणा बिल्कुल सही नहीं है। उनके समाज और हमारे समाज के बीच के अंतर को पाटना होगा और एक-दूसरे से मिलकर सुख-दुख को बांटना होगा। किन्नर एक संवेदना है जिसमें वेदना है। उन्हें कॉपी, कलम, किताब चाहिए; जीवन का हिसाब चाहिए। उन्हें इस धरा पर बराबर हक है। इसमें क्या शक है?
दो पल की ज़िन्दगी में हम भी मेहमान हैं, वह भी मेहमान हैं। तो फिर किसकी यातना से वह इतना परेशान हैं? एक दृष्टि से वह आधी स्त्री हैं, आधा पुरुष हैं और दूसरी दृष्टि से वह ना स्त्री हैं और ना पुरुष हैं। वह इस पीड़ा को मने-मन झेलते हैं, फिर भी ज़िन्दगी के खेल को खुशी-खुशी खेलते हैं। उनकी ज़िन्दगी शूल है, जो मौसम के प्रतिकूल है। उनके नसीब में न सुहागिन होने का सुख है ना बांझपन का दुख है।
डॉ. सुनील चौरसिया ‘सावन’
अटल नगर (अमवा बाजार), रामकोला, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश ।
9044974084