गुरुओं को प्रणाम
गीत
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यात्रा पर चल पड़ा हूॅं, ज्ञान का संदेश लेकर।
मंजिलों को प्राप्त करता, संकटों को मात देकर।।
राह से काॅंटे हटाकर, पथ सुगम उज्जवल बनाता।
मूढ़ता के इस तिमिर में, बोध का दीपक जलाता।।
मान की गठरी कमाई, ज्ञान का है दान देकर।
मंजिलों को प्राप्त करता, संकटों को मात देकर।।
है वनों की धूल छानी, पर्वतों को लांघ आया।
ऑंधियों के वेग झेले, तब यहाॅं तक पहुॅंच पाया।।
नाव दरिया में चलाई, कलम की पतवार खेकर।
मंजिलों को प्राप्त करता, संकटों को मात देकर।।
मैं सदा उनका ऋणी हूॅं, जिनसे मैंने बुद्धि पाई।
शब्द रचना मार्ग देकर, कलम ताकत की बताई।
राज अमृत पान करता, गुरुजनों के चरण धोकर।
मंजिलों को पार करता, संकटों को मात देकर।।
यात्रा पर चल पड़ा हूॅं, ज्ञान का संदेश लेकर।
मंजिलों को प्राप्त करता, संकटों को मात देकर।।
~ राजकुमार पाल (राज) ✍🏻
(स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)