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4 Sep 2025 · 1 min read

नात

नात
कैसे बयां करे भी कोई शाने-मुस्तफ़ा
सारे शजर हजर हैं सना ख़्वाने-मुस्तफ़ा

अब क्यों करें न अपने मुकद्दर पे नाज़ हम
होते हैं हम शुमार ग़ुलामाने-मुस्तफ़ा

हमको जला सकेगी न महशर की तेज़ धूप
होगा सरों पे साया-ए- दामाने-मुस्तफ़ा

आये हैं बन के रहमत ए आलम रसूल ए पाक
है सारी कायनात पे फ़ैज़ाने-मुस्तफ़ा

करबल महक रही है शहीदों के ख़ून से
सहरा भी बन गया है गुलिस्ताने-मुस्तफ़ा

सरकार की ज़बान ख़ुदा की ज़बान है
अल्लाह का ही हुक्म है फ़रमाने-मुस्तफ़ा

हमको जो ज़िंदगी का सलीक़ा सिखा दिया
ये सुन्नते-रसूल है एहसाने-मुस्तफ़ा

मँगते हैं हम दयार-ए-मुहम्मद के ऐ ‘अनीस ‘
वो हैं सख़ी तो हम है गदायाने-मुस्तफ़ा

अल्लाह को अज़ीज़ भी होते हैं वो ‘अनीस’
होते हैं जो भी लोग अज़ीज़ाने-मुस्तफ़ा

अनीस शाह अनीस

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