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4 Sep 2025 · 1 min read

#ग़ज़ल-

#ग़ज़ल-
■ दुल्हन है भगवान भरोसे…!!
【प्रणय प्रभात】

★ बेशुमार चोटें खाई हैं कई क़रारों की।
जगह कहाँ है इस दिवार में और दरारों की।।

★ पत्ते-पत्ते पे पतझड़ की पहरेदारी है।
हम किस मुंह से करें बताओ बात बहारों की??

★ सचमुच बड़ी हंसी आती है अक़्ल के अंधों पर।
गिरे पड़े हैं अंधकूप में बात मिनारों की।।

★ तर्पण से पुरखों को पानी कोरी बाते हैं।
बहती नदियां बुझा न पाईं प्यास किनारों की।।

★ फिर से लोकतंत्र के शव पर कौए टूट पड़े।
कांव-कांव सी चुभती हैं आवाज़ें नारों की।।

★ जितना कपड़ा लगा सियासी झंडे बैनर में।
उतने में ढंक जाती निश्चित देह हज़ारों की।।

★ लाखों रोग करोड़ों रोगी अरबों का खर्चा।
ठीक रहे आख़िर कैसे बस्ती बीमारों की।।

★ दुल्हन है भगवान भरोसे राह विरानी है।
नीयत भी कुछ ठीक नहीं है आज कहारों की।।

★ सबक़ छिपे होते हैं इनमें सुन भी लिया करो।
ग़लत नहीं होती बातें हम बरखुरदारों की।।

★ चार दिनों की पूछ-परख को हल्के में लेना।
पांच साल ख़िदमत करनी है ख़िदमतगारों की।।

★कुटिल सियासत के पालित इन नौकरशाहों ने।
ऐसी तैसी कर डाली सारे अधिकारों की।।

●संपादक/न्यूज़&व्यूज़●
श्योपुर (मध्यप्रदेश)

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