रामकथा : अंक -२
सुनी अजब ही रामकथा यह जीवन तर।
माँ की पीर न लिखी गई क्यों रत्ती भर।।
गढ़ी मंथरा और कैकेई की चुगली।
क्यों न सुमित्रा कौशल्या पर गई नजर।।
गुरु वशिष्ठ क्या मौन समाधी में बैठे!
मंत्रालय के ज्ञानी थे सब इधर उधर!!
कौशल्या सी कौन अभागिन थी जग में।
पुत्र गया वन, पति का साया रहा न सिर पर।।
क्या ‘सास भी कभी बहू थी’ तब से है!
सीता को कह दिया गेरूआ धारण कर।।
क्रमशः…