कोई उनको पढ़ता था तो डरता था
ग़ज़ल
गुण्डों का फिर गला ज्ञान से भर आया
गुण्डों ने फिर ज्ञान का मतलब समझाया
कथा-कहानी भी जैसे विज्ञापन थीं
कई साल तक उन्होंने सबको भरमाया
कोई उनको पढ़ता था तो डरता था
कैसे कहे कि कुछ भी नहीं समझ आया
हमने छेड़ी बात कि हमको लगी कहीं
उनको ऐसी बातों से आराम आया
एक हाथ में क़लम एक में चाकू था
उनकी भाषा समझ गया मैं, थर्राया
-संजय ग्रोवर
( तस्वीर: गूगल सर्च की मदद से )