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4 Sep 2025 · 5 min read

सौहार्द शिरोमणि संत डॉ. सौरभ पाण्डेय एवं उनका परिवार : मानवत

सौहार्द शिरोमणि संत डॉ. सौरभ पाण्डेय एवं उनका परिवार : मानवता का दीपस्तंभ

पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जा रहा है संत सौरभ की जीवनी

12 सौ से अधिक लगा चुके है चौपाल

संत सौरभ पर आधारित एक दर्जन से अधिक पुस्तके हो चुकी है प्रकाशित

धरती पर जब-जब अंधकार छाया है, तब-तब कोई न कोई व्यक्तित्व प्रकाश लेकर आया है। आज के युग में जब धर्म के नाम पर विभाजन, राजनीति के नाम पर स्वार्थ और जीवन के नाम पर भौतिकता हावी होती जा रही है, तब सौहार्द शिरोमणि संत डॉ. सौरभ पाण्डेय और उनका परिवार मानवता की राह दिखाने वाला जीवंत दीपस्तंभ बनकर सामने आया है।

गोरखपुर की पावन धरती पर जन्मे सौहार्द शिरोमणि संत सौरभ जी का जीवन हमें यह सिखाता है कि संतत्व केवल मठों तक सीमित नहीं होता, बल्कि समाज के बीच रहकर, आमजन की पीड़ा को समझते हुए सेवा करना भी संतत्व है।

धर्म का नया अर्थ : मानवता

संत सौरभ जी का सबसे बड़ा योगदान है कि उन्होंने धर्म को संकीर्ण परिभाषाओं से बाहर निकालकर उसे मानवता से जोड़ दिया।
उनका मानना है कि –
“मंदिर की घंटी, मस्जिद की अज़ान, गिरजाघर की प्रार्थना और गुरुद्वारे का कीर्तन अलग-अलग स्वर नहीं, बल्कि एक ही ईश्वर की स्तुति हैं।”

इसी सोच को मूर्त रूप दिया जाएगा धरा धाम इंटरनेशनल में। यह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि विश्व का पहला सर्वधर्म सौहार्द होगा जहां एक साथ मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा और बौद्ध विहार स्थापित करने की योजना है।यह स्थान दुनिया को यह संदेश देगा कि—
“धर्म विभाजन का नहीं, मिलन का माध्यम है।”

धरा धाम इंटरनेशनल अंतर्राष्ट्रीय परिवार: सपना जो साकार हुआ

शुरुआत में जब डॉ. पाण्डेय ने यह विचार रखा तो लोग संदेह करते थे। लेकिन आज गोरखपुर की धरा पर यह सपना हकीकत बन चुका है।
यहाँ आने वाले लोग देखते हैं कि कैसे एक ही प्रांगण में अलग-अलग धर्मों के प्रतीक खड़े हैं और सब मिलकर यह कहते हैं—
“ईश्वर एक है, मार्ग अनेक हैं।”

विदेशों से आने वाले विद्वान इसे Global Centre of Interfaith Harmony कहकर सम्मानित करते हैं।

परिवार : साधना और सेवा का संगम

डॉ. सौरभ पाण्डेय का परिवार भी उनकी ही तरह प्रेरणास्पद है।
संत सौरभ के पिता सोमनाथ पाण्डेय कृषक है।और बावा स्व रामचंद्र पाण्डेय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे।

डॉ. रागिनी (पत्नी) : सौहार्द शिरोमणि संत सौरभ जी की सहधर्मिणी रागिनी पाण्डेय ,जो शिक्षा और समाजसेवा में सक्रिय भूमिका निभाती हैं। वे न केवल परिवार की शक्ति हैं, बल्कि सामाजिक अभियानों में भी योगदान देती हैं।

श्वेतिमा माधव प्रिया (पुत्री, 8 वर्ष) : इतनी छोटी उम्र में ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भागवत कथावाचिका बन चुकी हैं। उनकी वाणी में अध्यात्म की शक्ति है।

बाल भक्त सौराष्ट्र (पुत्र, 4 वर्ष 7 माह ) : बचपन से ही भगवद्गीता का अध्ययन कर रहे हैं। संत सौरभ जी का स्वप्न है कि वे भविष्य में एक विश्वस्तरीय धार्मिक कथावाचक बनें।

यह परिवार दर्शाता है कि घर केवल एक निजी संस्था नहीं, बल्कि समाज और मानवता के लिए प्रेरणा का केन्द्र भी हो सकता है।

समाजसेवा के अनगिनत आयाम

संत सौरभ पाण्डेय और उनका परिवार केवल विचारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने हर क्षेत्र में ठोस कार्य किए—

शिक्षा : गरीब बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा अभियान।

नशामुक्ति : युवाओं को नशे से दूर करने के लिए शिविर और जागरूकता कार्यक्रम।

पर्यावरण : हरियाली विवाह अभियान और वृक्षारोपण।

स्वास्थ्य : अपनी धर्म पत्नी रागिनी के साथ देहदान संकल्प और निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर एवं देहदान के प्रति लोगों के प्रेरित करने के लिए चौपाल का आयोजन

सामाजिक सौहार्द : सभी धर्मों के त्योहार एक साथ मनाने की परंपरा।

युवा सशक्तिकरण : खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम और नेतृत्व प्रशिक्षण।

मानव एवं पशुओं को सड़क दुर्घटना से बचाने के लिए 10 वर्षों से गाड़ियों पर रेडियम,गलियों के सड़क पर बने ब्रेकर पर रेडियम लगाने एवं मवेशियों के गले में रेडियम रिफ्लेक्टर लगाते रहते है।

चुनौतियों से अडिग संकल्प तक

इतने बड़े कार्य में कठिनाइयाँ आना स्वाभाविक था। कट्टरपंथी, स्वार्थी लोग और आलोचक अक्सर उनके मार्ग में बाधाएँ बने। कभी उपहास उड़ाया गया, कभी अपमान किया गया। लेकिन डॉ. पाण्डेय ने हमेशा शांति और प्रेम का रास्ता चुना।
वे कहते हैं—
“यदि कोई पत्थर फेंके तो उसे मंदिर की नींव में लगा दो।”

यही सकारात्मक दृष्टिकोण उनके आंदोलन को शक्ति देता है।

संत और संपादक

संत सौरभ पाण्डेय केवल धार्मिक और सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि एक सशक्त पत्रकार भी हैं। स्वतंत्र जनमित्र सांध्य दैनिक के प्रबंध संपादक के रूप में उन्होंने समाज की सच्चाई को उजागर करने का साहस दिखाया।
उनका मानना है कि –
“कलम तलवार से अधिक शक्तिशाली है, क्योंकि यह रक्त नहीं, विचार बहाती है।”

प्रेरणा का संदेश

आज जब धर्म के नाम पर संघर्ष और हिंसा बढ़ रही है, तब डॉ. पाण्डेय और उनका परिवार यह सिखाता है कि—

धर्म का असली स्वरूप सेवा है।

सच्ची पूजा मानवता की रक्षा है।

असली साधना गरीब के आँसू पोंछना है।

और सबसे बड़ा तीर्थ वह दिल है जिसमें सबके लिए प्रेम हो।

भविष्य की दिशा

संत सौरभ जी का सपना है कि धरा धाम का यह मॉडल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में स्थापित हो। वे चाहते हैं कि हर देश में एक ऐसा स्थान बने जहाँ सभी धर्म साथ खड़े होकर मानवता का संदेश दें।वो
उनकी बेटी श्वेतिमा माधव प्रिया और पुत्र सौराष्ट्र भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे यह परिवार भविष्य में भी समाज को दिशा देता रहेगा।

पाठ्यपुस्तक लेखक सर्वेश कांत वर्मा द्वारा संपादित नूतन हिंदी (कक्षा 10, 11, 12), जो उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् द्वारा मान्यता प्राप्त तथा नगीन प्रकाशन से प्रकाशित है, में संत सौरभ पर आधारित अपठित गद्यांश, पद्यांश एवं निबंध शामिल किए गए हैं।
उक्त काव्य एवं गद्य लेखन डॉ. राम कृपाल राय, डॉ. अमिताभ पाण्डेय, सुनीता सिंह सरोवर तथा डॉ. आर. सी. यादव द्वारा किया गया है।

संत सौरभ पाण्डेय और उनका परिवार वास्तव में आज की दुनिया के लिए एक जीवंत प्रेरणा है। जब लोग यह सोचते हैं कि समाज बदलना असंभव है, तब यह परिवार साबित करता है कि एक परिवार भी पूरे समाज और दुनिया में बदलाव का बीज बो सकता है।

आज आवश्यकता है कि हम इस परिवार से प्रेरणा लेकर अपने-अपने जीवन में मानवता, सेवा और सौहार्द को स्थान दें।
क्योंकि अंततः वही समाज महान बनता है, जहाँ हर घर एक धरा धाम बन जाए और हर इंसान एक संत का जीवन जी सके।

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