अजब खेल खेले हमारा मुकद्दर
अजब खेल खेले हमारा मुकद्दर
दिखाता हमें कैसे -कैसे ये मंजर
सभी की यहाँ अहमियत अपनी अपनी
नहीं पाँचों उँगली हैं होती बराबर
बिखर वो गया वक़्त की आँधियों में
बनाया जो हमने बड़े प्यार से घर
कहाँ कुछ कभी भी मिला मन मुताबिक
लगी प्यास जब भी तो पाया समंदर
कई रूप रंगों का जीवन हमारा
अलग रंग अंदर अलग रंग बाहर
परेशानियों में जो हारे न हिम्मत
वही बन सकेगा यहाँ पर सिकंदर
नदी की तरह मार सह पत्थरों की
हमें बहते रहना है जग में निरंतर
हमारे लिए अश्क ही हीरे मोती
लुटाते उन्हें हम, कोई भी हो अवसर
नहीं ‘अर्चना’ सिर्फ़ दौलत कमाओ
असर देखना कुछ दुआएँ कमाकर
डॉ अर्चना गुप्ता
03.09.2025