प्रिय शिष्य दीपांशु का भावपूर्ण पत्र पढ़कर भावुक हुए डॉक्टर सुनील चौरसिया 'सावन'
केंद्रीय विद्यालय गांगरानी कुशीनगर के कक्षा छठवीं का छात्र दीपांशु ने अपने गुरु सुनील चौरसिया सावन अर्थात् मुझे समर्पित इतना भावपूर्ण पत्र लिखा जिसे पढ़कर मैं भावुक हो गया।
उस मनहर पत्र को पढ़कर आप भी महसूस करेंगे कि जहां निष्छल एवं निर्मल प्रेम होता है वहां भाषा भले ही अबोध होती है लेकिन भाव सुबोध होता है। जुड़ाव ही जिंदगी है। सफल शिक्षक वह होता है जिससे शिष्य सहजता से जुड़ पाते हैं और अपने मन की बातें कह पाते हैं। एक दूसरे का सम्मान करना शिक्षक और शिक्षार्थी का नैतिक कर्तव्य होता है। शिक्षक उस चिकित्सक के समान होता है जो असाध्य रोग से पीड़ित मरीज का इलाज बिना झुंझलाए बड़ी सहजता एवं सरलता से करता है। कक्षा का वातावरण भय मुक्त होना चाहिए। शिक्षण कार्य सिर्फ विचारात्मक नहीं अपितु भावात्मक होना चाहिए। कक्षा कक्ष में अपनत्व एवं ममतत्व का भाव बहुत जरूरी है। शांत दिमाग से हर समस्या का समाधान संभव है। विद्यार्थी को देखकर महसूस करें कि एक दिन हम भी विद्यार्थी थे। शिक्षक और शिक्षार्थी एक सिक्का के दो पहलू हैं। विद्यार्थी के मन में शिक्षक के प्रति सम्मान भाव जितना जरूरी है उतना ही जरूरी है शिक्षक के मन में विद्यार्थी के प्रति वात्सल्य भाव। कक्षा कक्ष में ज्ञान के साथ भाव का बहाव बहुत जरूरी है।
-डॉ. सुनील चौरसिया ‘सावन’