जैसे अभी तक जीये हम अकेले
जैसे अभी तक जीये हम अकेले, आगे भी ऐसे ही जी लेंगे हम।
चले जावो तुम भी हमें छोड़कर, तुम्हारे बिना भी रह लेंगे हम।।
जैसे अभी तक जीये हम अकेले—————-।।
कौन यहाँ ऐसा साथी हुआ है, बर्बाद जो हुआ यारी के लिए।
कुर्बानी किसने दी है अपनी, अपनी वफ़ा और साथी के लिए।।
पसंद नहीं तुमको आदत हमारी तो, तोड़ दो यारी हमसे तुम।
जैसे अभी तक जीये हम अकेले—————-।।
हमसे खता क्या ऐसी हुई है, जो तुम हमसे रूठ गये।
मोहब्बत हमारी ठुकराकै तुम, दूर जो हमसे हो गये।।
बहुत कुछ सहा है हमने तो साथी, यह गम भी सह लेंगे हम।
जैसे अभी तक जीये हम अकेले—————-।।
मगर आदमी हम ऐसे नहीं है, निराश जिंदगी से हो जाये यारा।
खुश और आबाद दिल है हमारा, महका हुआ है गुलशन हमारा।।
क्यों हम इसे कहे अपनी बदनसीबी, चाहे मत निभाओ यारी तुम।
जैसे अभी तक जीये हम अकेले—————–।।
शिक्षक एवं साहित्यकार
गुरुदीन वर्मा उर्फ़ जी.आज़ाद
तहसील एवं जिला-बारां(राजस्थान)