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3 Sep 2025 · 2 min read

एक और ब्रह्मराक्षस

हूक सी उठती थी
ज्वालाएं फूफकारता
विचर रहा था यहां वहां
रात का आकाश
काला नहीं था,
बल्कि नीले धुएँ से बुना हुआ
एक रहस्यमय जाल था।
उस जाल में कैद था
एक और ब्रह्मराक्षस।

उसकी आँखें
अंगार की तरह जलती थीं,
पर ज्वाला बाहर न निकलकर
भीतर ही भीतर
देह को भस्म करती रहती।

उसकी छाती पर बँधी थीं
सैकड़ों अदृश्य जंजीरें
परिवार की अपेक्षा,
समाज की मर्यादा,
मोह और आग्रह का भार।
वह दानव शक्ति से बड़ा नहीं,
बल्कि असहायता से बड़ा था।

वह चीखना चाहता था
पर होंठों पर किसी और की चुप्पी
आकर ताला जड़ देती।
वह उड़ना चाहता था
पर पंख कसकर बाँध दिए गए थे
कर्तव्य और भय की डोरियों से।

उसकी चाल
कभी तेज़ नहीं हुई,
वह रेंगता रहा उन्हीं पगडंडियों पर
जहाँ लोग कहते
यही उचित है,
यही तुम्हारा धर्म है।

और वह
बाहर से विकराल दिखते हुए भी,
भीतर से कैदी था।
मानव मन का कैदी।

फिर उस ब्रह्मराक्षस पर
आरोप लगे
हेयता के,
चरित्रहीनता के।

वह खड़ा रहा
भीड़ के बीच,
जैसे धधकती आग पर
नंगे पाँव चलता कोई यात्री।
उसकी देह काँपती,
पर चेहरा निर्विकार।

क्योंकि वह जानता था
ये अपराध उसके नहीं,
बल्कि उन आँखों के थे
जिन्हें उसकी बेचैनी चुभती थी।

वह था निरपराध
किन्तु अपराधी की तरह देखा गया।
भीड़ की दृष्टियाँ
उसे नंगा करती रहीं,
जैसे चीलें
जीवित देह नोचती हों।

और आश्चर्य!
वह अब भी मोह रखता था।
ठुकराने वालों से,
जलील करने वालों से।
उसकी आँखें
उन पर टिकी थीं
मानो अपमान ही
प्रेम का दूसरा नाम हो।

उसका हृदय कहता
शायद एक दिन
वे समझेंगे मुझे।
और यही आशा
उसकी सबसे बड़ी कैद बन गई।

फिर एक दिन
वह फट पड़ा।
उसकी चीखें
अंधेरी गलियों में गूँजीं
जैसे पृथ्वी का लावा
आकाश को चीरकर निकल आया हो।

उसकी आँखें
सुलगते सूर्य की तरह थीं,
उसके शब्द
तप्त धातु की धार।
वह भीड़ से भिड़ गया

मैं अपराधी नहीं हूँ!
मैं तो तुम्हारी आँखों का आईना हूँ।
मेरा दोष यही है
कि मैं तुम्हें
तुम्हारी सच्चाई दिखाता हूँ।

क्षणभर को
भीड़ काँपी,
उसकी आग भीतर उतर गई।
पर फिर
मोह ने उसकी रीढ़ तोड़ दी।

जिनसे वह करता रहा स्नेह,
जिन्हें अपने आँसुओं में
डुबोता रहा,
जिनके पैरों में
अपना जीवन बिछाता रहा,
उन्हीं हाथों ने
उसका गला दबा दिया।

उसकी मौत
प्राकृतिक नहीं थी।
वह मरा
अपने ही प्रेम के बोझ से,
अपने ही संबंधों की रस्सियों से,
अपनी ही भक्ति की सज़ा से।

© अमन कुमार होली

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