Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
3 Sep 2025 · 1 min read

चाँद छुप-छुप झाँकता है...

रोज खिड़की में उझककर,
चाँद छुप-छुप झाँकता है।
कौन जाने रात भर ये,
रूप किसका आँकता है।

देख ले इसकी झलक तो,
तम सघन भी जगमगाए।
चल रहा धुन में अकेला,
गम कहीं अपना छुपाए।
रात की काली चुनर में,
गोट-तारे टाँकता है।

चाँद छुप-छुप झाँकता है।

©सीमा

Loading...