बरसात की लगी है ऐसी झड़ी
बरसात की लगी है ऐसी झड़ी
बरसात की लगी है ऐसी झड़ी,
घर से निकलते ही मुसीबत पड़ी।
जैसे ही छतरी बाहर लेकर निकले
छतरी भी हमारे मुँह पर ओधे पड़ी।।
सड़को पर नदियाँ ही बहती है,
इन नदियों मे नावे ही चलती है
नगरपालिका भी मजे मे बैठी है
बस जनता ही मुसीबत सहती है।।
घरो मे चाय सँग पकोडे बनते है,
अब घर से ही ऑफिस चलते है।
सब स्कूलों की छुट्टी भी हो गई है
बच्चे भी घर से पढ़ाई करते है।।
हो गई बहुत वर्षा धूप खिलनी चाहिए,
चारो तरफ सीलन है ये मिटनी चाहिए।
हो गए सब परेशान घरो मे सब बंद है,
गगन से काली घटा ये छटनी चाहिए।।
बांध सब टूटे सरोवर सब भर गये,
जल प्रलय के कारण गांव बह गये।
करे तो कैसे करे इसका मुकाबला,
लिखा था जो भाग्य मे उसे सह गये।।
आर के रस्तोगी गुरुग्राम