यमराज से मिलन
कितना हसीं वो पल होगा, यमराज जब मिलने लाइन में होगा,
हर सांस थमती जाएगी, जीवन सदी का अंत वहीं होगा।
श्मशान की ओर बढ़ते कदम, ढोलक न होगी, शंख बजेगा,
सन्नाटे की चादर तले, हर मन का स्वर भी मौन होगा।
लिपटे सफेद कफ़न में मैं, कांधे पे लेकर सब जाएंगे,
राहें चुपचाप कहेंगी बस, “अब ये सफर आख़िरी होगा।”
रोते हुए वो चेहरे प्रिय, जल की धारा संग बह जाएंगे,
आँसू भी आग से मिलकर, धुआँ धुआँ बन उड़ जाएगा।
चिता पे फूल सजेंगे जब, चिंगारी कोई छू लेगी,
एक पल में मेरा तन राख, हवाओं में विलीन होगा।
पंडित पढ़ेगा गीता के, श्लोक किसी मधुर स्वर में,
मृत्यु से भी पार की राह, कर्मों का आभास देगा।
राख उठाकर गंगा में, बहते जल संग वो मिल जाएगी,
धारा पुकारेगी फिर मुझको, अनंत का संदेश वही होगा।
‘मुकेश’ कहो अब मिट जाना भी, जीवन का उत्सव बन जाएगा,
कितना हसीं वो पल होगा, जब मरकर भी मैं अमर रहूँगा।
स्वरचित एवं भावपूर्ण
मुकेश “कविवर केशव” सुरेश रूनवाल