प्रेम का सफ़र
जब काग़ज़ नहीं था,
तो प्रेम आँखों से पढ़ा जाता था,
मौन में छिपा, धड़कनों की भाषा में समझा जाता था।
जब काग़ज़ आया, तो प्रेम को शब्द मिले,
स्याही से बहते जज़्बातों को रंग मिले।
बटन वाले फ़ोन ने दूरी मिटा दी,
आवाज़ों में छिपी तड़प ने नज़दीकी बना दी।
अब व्हाट्सऐप और इमोजी का ज़माना है,
जहाँ दिल की जगह कॉपी-पेस्ट बहाना है।
पर सच्चा प्रेम आज भी वही है,
न मौन का मोहताज, न काग़ज़ का आश्रय,
वो तो बस एहसास है—
जो नज़र से नज़र मिलते ही सब कुछ कह जाता है।