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1 Sep 2025 · 1 min read

प्रलंयकारी कहर

प्रलंयकारी कहर
सबके लिए है हमारे दिल में सम्मान
अपने पराये का सब भेद मिटा कर
शत्रुता का कभी भी विचार न आया
मन में मैत्री भाव का दीप जला कर
यह क्या अब तो हमारे चारों ओर ही
काला काला बादल मंडराने लगा है
मित्रता के भाव का सब अर्थ भी तो
जैसे अब पूरी तरह बदलने लगा है
नाग पाश में हमें जकड़ने को जब
अकारण किसी का मन मचलने लगे
हमारे स्वाभिमान को भी धूमिल कर
अस्तित्व को ही जब झकझोरने लगे
तब तो उनका सामना करने वाला
कायर नहीं प्रलंयकारी कहर हैं हम
दुश्मनों का पूर्ण अंत कर देने वाला
समुद्र मंथन से निकला जहर हैं हम
पारस नाथ झा

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