प्रलंयकारी कहर
प्रलंयकारी कहर
सबके लिए है हमारे दिल में सम्मान
अपने पराये का सब भेद मिटा कर
शत्रुता का कभी भी विचार न आया
मन में मैत्री भाव का दीप जला कर
यह क्या अब तो हमारे चारों ओर ही
काला काला बादल मंडराने लगा है
मित्रता के भाव का सब अर्थ भी तो
जैसे अब पूरी तरह बदलने लगा है
नाग पाश में हमें जकड़ने को जब
अकारण किसी का मन मचलने लगे
हमारे स्वाभिमान को भी धूमिल कर
अस्तित्व को ही जब झकझोरने लगे
तब तो उनका सामना करने वाला
कायर नहीं प्रलंयकारी कहर हैं हम
दुश्मनों का पूर्ण अंत कर देने वाला
समुद्र मंथन से निकला जहर हैं हम
पारस नाथ झा