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1 Sep 2025 · 2 min read

फुटपाथ पर कविता

फुटपाथ पर
बिखरी पड़ी है कविता,
सस्ती झालमुड़ी या नाश्ते के
दोने के रूप में
साथ कचरे के ढेर में
हां, कोई फेंक गया हो।
उस पर बैठी मक्खियाँ,
और छपी फोटो को
लार वाले जीभ से
चाट रहें हैं कुत्ते।

लाइब्रेरी की अलमारियों में
धूल खाती पड़ी हैं वही मैगज़ीनें,
जिन्हें लिखने में किसी ने
अपना पूरा यौवन जला दिया था।
और कोनों में दीमक
धीरे-धीरे निगल रही हैं
किसी कवि की आत्मा का अंश।
स्याही में पिघले सपने,
पन्नों में बंद आक्रोश,
और शब्द जो कभी
रक्त में आग भर देते थे।

वह कविता
जो कभी रणभेरी की तरह बजती थी,
आज उपेक्षा की खामोशी में
गुम हो चुकी है।
जिसने कभी युवाओं की नसों में
क्रांति की लहर जगाई थी,
आज वही कविता
फुटपाथ पर अनसुनी पड़ी है।

धन, ऐश्वर्य और वैभव के तराजू पर
कभी जिसे तौला गया था,
आज वह मात्र
उदासीनता की वस्तु है।
कवि की पीड़ा
अब किसी को नहीं सुनाई देती
क्योंकि शब्द मरते नहीं,
लोग मरते हैं उन्हें सुनने से पहले।

आज कवि को लोग उलाहना देते हैं
ये तो यूँ ही बकते हैं,
इनका काम है बकना
और तालियाँ बजाकर
आपस में ही मोद मनाना।

लिफ़ाफ़ा मिले तो शुक्र है,
चादर मिले तो वाह-वाह,
शाल ओढ़कर आत्मा को तुष्ट कर लेना
यही इनकी साधना है।

साहित्य की राजनीति में
कवि अब सिर्फ चेहरा हैं,
सम्मान-सम्मान खेल में
नाम और पदक के टुकड़े हैं।
कविता के स्वर
जो कभी आंधी बनते थे,
अब होटल की दावतों में
कुर्सियों पर दबकर बैठ जाते हैं।

कभी कविता थी क्रांति का घोष,
आज वह मंचों पर
“हास्य–रस” के शोर में डूब जाती है।
कभी कविता थी जनता की चीख,
आज वह प्रायोजकों की मर्जी
और दर्शकों की ऊब
के बीच बेमन से ताली पाती है।

लोग कहते हैं
कविता से पेट नहीं भरता,
कविता से नौकरी नहीं मिलती,
कविता से समाज नहीं बदलता।
कविता से बस
कवि अपनी आत्मा बहलाता है।

पर वे भूल जाते हैं
जब तलवारें कुंद हो जाती हैं,
जब शस्त्र चुप हो जाते हैं,
तब एक पंक्ति,
एक स्वर,
एक कविता
पूरे युग को जगा देती है।

आज कवि को उपहास मिलता है,
कल उसी की बकबक
इतिहास कहलाती है।
जो आज धूल खाती किताबों में
पड़ी हैं,
वही कल
नए युग की आग बनेंगी।

कवि कभी मरता नहीं
उसकी उपेक्षा मरती है,
उसकी कविता
मौन के गर्भ में
नई क्रांति को जन्म देती है।

वे भूल जाते हैं कि
इन्हीं “बकवासों” से
कभी साम्राज्य हिले थे,
युवाओं की नसों में
आग दौड़ी थी,
और मौन जनता ने
अपना स्वर पाया था।

आज कवि को
हंसी का पात्र समझा जाता है,
पर इतिहास जानता है
हर क्रांति की पहली चिंगारी
किसी कवि की “बकबक” से ही
निकली थी।
और फुटपाथों और चौपालों
से उड़ती उड़ती
नसों में फड़की
क्रोध भड़की
और बदल गये भूगोल
वर्तमान हो गया
काल का ग्रास।
लिखा गया कविता
का लहू से लाल इतिहास।

© अमन कुमार होली

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