कुण्डलिया छंद
!! श्रीं !!
सुप्रभात !
जय श्री राधेकृष्ण !
शुभ हो आज का दिन!
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कुण्डलिया
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अपना जब तन भी नहीं, किसका करे गुमान ।
मान मिला तो खुश हुआ, दुखी देख अपमान ।।
दुखी देख अपमान, शब्द कड़़वे चुभ जाते।
मिला अगर सम्मान, हँसें अति मोद मनाते।
कारक होते कर्म, भाव उर समता रखना।
सब कुछ प्रभु का जान, सोच मन क्या है अपना ?
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महेश जैन ‘ज्योति’,
मथुरा ।
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