तू समझ ना पाता है
तेरे आहट से ही
मेरे कंकड़ राह
फूल बन जाते हैं
तेरी हर मुस्कान
निज मन प्रसन्न कर जाती है।
मैं तेरा होकर भी
पराया सा ठहर जाता हूँ,
तेरे पास रहकर भी
तुझ तक दृष्टि न पहुँचा पाता हूँ।
मन की वीणा में
बस तेरा ही राग गूँजता है,
पर तू उस स्वर को
सुनकर भी न समझ पाता है।
तू हृदय के कुंज में
जीवन का उजियारा है
प्रेम का सागर हु मैं
तू बूंद तक ना बरसता है।
तेरे सपनो को
अपने सा जीता हूं
खुद को दर्पण में
तुझ सा पता हूं।
अति प्रेम ,
गर करूं मै
तू प्रीति न समझ पाता है।
तेरे बिन तड़पु
तुझको भटकूं
तू पीर समझ ना पाता है
तुझमें साजी
तुझसे राजी
तुझको ,जीवन तृण कर जाऊं मै
मन दर्पण में शोभित है
प्रणय, तू समझ न पाता है ।
@ अभिषेक