फुर्क़त की तन्हा रातों में क्यों वस्ल की याद दिलाते हो
फुर्क़त की तन्हा रातों में क्यों वस्ल की याद दिलाते हो
मरहम न सही कुछ बात नहीं क्यों ज़ख़्म कुरेदे जाते हो
छोड़ो अब माज़ी की बातें वो गुज़रा ज़माना बीत गया
उसने जो राह अलग ले ली उस राह पे क्यों ले जाते हो
तुम जानते हो फ़ितरत मेरी हर बात पे गिर्या करती है
क्या शौक़ है तुमको क्यों अक्सर तुम ज़िक्र उसी का लाते हैं
हम अक्ल के मारों को तुमने क्या समझाने की ठानी है
क़ूवत ही नहीं क्या समझेंगे मन्तिख जिनको समझाते हो
इक दिन ये दौलत शोहरत सब कुछ छोड़ यहीं जाना होगा
क्यों इनकी की हसरत में पड़कर मेयार गिराए जाते हो