बदलते दौर का बिगड़ता अंदाज
बदलते दौर का बिगड़ता अंदाज
आधुनिकता के दौर में फैंशन का चढ़ा बुखार।
बनावटी सा नजर आये न शर्म की है दीवार।
बदल गई है संस्कृति अब बदल गया समाज,
आज देखो बदलते दौर का बिगडता अंदाज।
खो गये रिश्ते न जाने कहाँ खो गया है प्यार,
एकल परिवार सुहाए खोया संयुक्त परिवार।
अब अपने ऐशो आराम में रहते है लोग मस्त,
किसी की परवाह नहीं अपने आप में व्यस्त।
चिंता की तपन में जलते, दिल में दर्द हजार,
खुशियों के मोहताज है चाहे दौलत बेशुमार।
आजकल बच्चों को देखो करते नहीं लिहाज,
मान सम्मान छोड़ो भैया मुँह में नही आवाज।
बडों की इज्ज़त मान-मर्यादा न कोई संस्कार,
नित-रोज पार्टी मनाते वो दिल के नहीं उदार।
जिंदगी में उलझने बहुत चेहरे पे झूठी मुस्कान,
तमाम बीमारियाँ लेकर आज जी रहा इंसान।
✍ सुमन अग्रवाल “सागरिका”
आगरा
स्वरचित