जादुई दुनिया
जादुई दुनिया में जीते हैं हम।
रोते नहीं ,
फिर भी अश्क पीते हैं हम।
नये नये सपने तैरते हैं आंखों में
सोते नही
फिर भी ख्वाब टहलते हैं रातों में।
अजनबी लोग दोस्त हम बनाते हैं
दुश्मन नहीं
मां-बाप से भी दंगा हम कमाते हैं
हरिश्चन्द्र की औलाद खुद को माने
सच नहीं
झूठ बोल कर ही खुद को पहचानें
अजब जादुई दुनिया सामने है अपने
तिलिस्म नहीं
फरेब ,धोखा ,झूठ ही हैं अब सपने
सुरिंदर कौर