#लघुकथा..
#लघुकथा..
यथा मदारी, तथा जमूरे।
(प्राणी प्रभात)
बड़े शहर का एक हलवाई संयोग से मेरे शहर में आ गया। किसी से मेरे चटोरेपन का पता चल गया था शायद उसे। पता पूछते पूछते आ धमका घर पर। सामान्य दुआ सलाम के बीच परिचय का आदान प्रदान हुआ। पता चला कि बंदा कस्बे में दुकान जमना चाहता है। कुछ अच्छे सहायकों की तलाश में है। मेरे खानपान पसंद होने के कारण उसे भरोसा था कि में इस खोजबीन के लिए उसका अच्छा सलाहकार हो सकता हूं।
मैने समझाने का प्रयास किया कि कस्बा छोटा है। कस्बे में हुनरमंद कामगारों का टोटा है, मगर अगला इस सच को समझने के लिए राज़ी नहीं था। दावा करने लगा कि उसने तमामों को पाक कला में कुशल बनाया है। हुलिए, हावभाव और बातों से लगा कि बड़ा उस्ताद है पाक कला में। मोबाइल में ढूंढा और दे दिया एक बंदे “दामू” का नंबर। “वोकल फॉर लोकल” की भावना से प्रेरित होकर।
महाशय को बिदा करने के बाद पहली फुर्सत में दामू को कॉल किया। उसे बताया कि उसकी बेगारी के दिन लद चुके हैं। उसे एक अच्छा काम मिलने वाला है। यह केवल इसलिए कि उन दोनों के बीच संवाद हो जाए और मेरा पीछा छूटे। एक निखट्टू को काम और एक उद्यमी को कामगार मिल जाए, इसमें मेरा कौन सा घाटा था?
आठ दिन बाद महाशय फिर पधार गए। हाथ में पाव भर मिठाई का फिना डिब्बा लिए। चेहरे पर पहले से ज़्यादा चमक और आवाज़ में चहक। छूटते ही जो बोले वो किसी झटके से कम नहीं था। उनके कहे अनुसार दामूू एक निपुण रसोइया था। यही नहीं, उसके साथ काम पर आए “घीसा” और “चिरौंजी” भी निपुण थे। हर तरह की सब्ज़ी व खीर, रायता, मिठाई आदि बनाने में।
एक तरह से यह मेरे आंकलन को ग़लत साबित करने की कोशिश थी। वो भी दुकान चालू होने की सूचना के साथ। थोड़ा सा खेद दुकान के उद्घाटन की सूचना न मिलने का हुआ। उससे कहीं अधिक कष्ट दामू की कृतघ्नता से हुआ, नया काम मिलने के बाद एक कॉल तक नहीं कर पाया। नहीं बता पाया कि उसके साथ साथ उसके दो नालायक साथियों का भी भला हो गया है।
उस्ताद जी तनी हुई छाती और उठी हुई गर्दन के साथ कूच कर गए। उनके जाने के बाद भी मेरे लिए उनके वचनों पर भरोसा करना मुश्किल था। भटे की सब्ज़ी जीरे से और अरबी की तरकारी मैथी से छोंक कर तमाम रसोई बिगाड़ चुके दामू को मै उसके छुटपन से जानता था। घर पड़े मुफ्त की रोटी तोड़ने वाले घीसा और चिरौंजी तो उससे भी बड़े निकम्मे थे। जिन्हें ये तक पता नहीं था कि अरबी में अजवायन और पोहे में राई का बघार लगता है।
तीन मिनट की पशोपेश के बीच मुझे समझ आ गया कि माजरा क्या है। अक़्ल ने सरगोशी करते हुए तत्काल कान में कह दिया, कि नए चेलों से अधिक गड़बड़ पुराने उस्ताद में है। जिन्हें शायद स्वयं पता नहीं था कि भोजन और व्यंजन बनते कैसे हैं। रही सही कसर डिब्बा खोलने के साथ पूरी हो गई। डिब्बे में आधा दर्जन पेड़े थे, जिन पर सज्जा के लिए लोंग लगी हुई थी। अनुमान पुष्ट हो चुका था।
लगा कि अगली बार आए, तो अच्छे से ख़बर लूंगा। पता करूंगा कि कहां से मिला पाक कला का ज्ञान। प्रतीक्षा बनी रही किन्तु अगले दो हफ़्ते तक पूरी नहीं हुई। एक दिन किसी परिचित के आयोजन में बस स्टैंड की ओर जाना हुआ तो दुकान देखने का विचार बना। मौके पर पहुंच कर पता चला कि दुकान तो दूसरे ही दिन बंद हो गई। पीतल के तसले में दही जमाने और सरसों के तेल में जलेबी तलने के कारण मचे हंगामे के बाद। लौटते में देखा कि घीसा और चिरौंजी एक घर के बाहर चबूतरे पर बैठे बीड़ी फूंक रहे थे। जबकि हर वक्त साथ रहने वाली तिकड़ी का मुख्य चेहरा नदारद था। समझ में आ गया कि शहर से कस्बे में आए उस्ताद भी किसी गांव खेड़े का रुख कर गए होंगे। ख़ुद के बूते नया खोमचा लगाने के लिए।।
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