कश्मीर
कश्मीर हूँ मैं –
बाधाओं का एक घेरा हूं,
जलता हुआ अंधेरा हूं
पृथ्वी पे स्वर्ग मैं साज हूँ,
सुशोभित हिंद का ताज हूँ
उन हिमगिरियों का डेरा हूँ,
सब धर्मो का मैं बसेरा हूँ
वो अग्नि-वायु-नीर हूँ मैं,
हाँ! कश्मीर हूँ मैं |
फूलों की में एक धारा हूँ,
तरुणों से भरा मैं सारा हूँ
सुंदर सा प्रस्तुत गीत हूँ मैं,
औरों की वो एक मीत हूँ मैं
रोशनी से भरा एक तारा हूँ,
अब तक न कभी मैं हारा हूँ
अमृत से भरा हुआ क्षीर हूँ मैं,
हाँ! कश्मीर हूं मैं ।
मैं मृत्यु की एक लहर हूँ,
शत्रु के पथ पे कहर हूँ
सीमाओं की वो जंग हूँ मैं,
ध्वज का वो केसरी रंग हूँ मैं
शत्रु की पूरी हार हूँ,
सम्मुख उसके ललकार हूँ
एक योद्धा और एक वीर हूँ मैं,
हाँ! कश्मीर हूँ मैं |
वो पूरे देश की आस हूँ,
शत्रु के सबसे पास हूँ
वो खुद में एक उपकार हूँ मैं,
पूरे भारत का सार हूँ मैं
वो देश-विदेश का रस्ता हूँ,
मैं रोता हूँ- में हँस्ता हूँ
एक रंग-बिरंगा चीर हूँ मैं,
हाँ! कश्मीर हूँ मैं ।
~ पार्थ सारथी शुक्ल