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31 Aug 2025 · 1 min read

आत्मा

नाम आत्मा –

करता जो तू, खुद पे गुमान
मुझ बिन तू बस, मुर्दा समान
सर्व शक्तिमान हूँ मैं महान्
हूँ तुझमे भी तू मुझको जान
जन-जन में पूर्ण समाता मैं
मृत्यु को कभी न पाता मै
तेरे सुख-दुःख का दाता मै
तुझे छोड कहीं न जाता मैं
यदि चला छोड़ के जाऊँ मैं
फिर लौट कभी न आऊँ मैं
तुझसा ही किसी को लाऊँ मैं
तब गया वो जीवन पाऊँ मै
जबा, कृष्ण ने भी यह ज्ञान बताया
पार्थ को मेरा मान बताया
मुझको ब्रह्म का वंश बताय
ईश्वर का मुझे अंश बताया
जीता तीनों काल में मैं
जीवन-मृत्यु के जाल में मैं
हूँ मैं धरती, पाताल में मैं
और समय की वो उस चाल में मैं
जल जाता जग, मैं जलूं नहीं
गल जाता जग, मैं गलूँ नहीं
अस्त्रों-शस्त्रों से कटू नहीं
मृत्यु में कभी मैं मरू नहीं
तेरे अन्दर की भक्ति मैं
तेरे अन्दर की शक्ति मै
हर एक जीव, हर पक्षी मैं
प्रेतों के रूप में भक्षी मैं
वो देव लोक का दूत भी में
मानव हूँ मैं. हूँ भूत भी मैं
मैं सर्व लोक में व्यापी हूं
मैं हरि नाम का जापी हूँ
क्यों तुझमें यूँ मैं समाया हूं
मैं कौन-कहाँ से आया हूं
न देव हूँ, न कोई साया हूं
मैं नाम आत्मा पाया हूं।
बस राम आत्मा पाया हूं।।
-पार्थ सारथी शुक्ल

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