लंकेश्वर
लंकेश्वर
यह बात रामायण के युद्ध के अंतिम चरण की है,
जब रावण के तीर लगा है और रावण मूर्छित अवस्था में है…
कि, अंत हुआ रामायण का जब भूसाई लंकेश पड़े।
उस ज्ञानी से ज्ञान लेने को समक्ष नाग वो शेष खड़े।।
शेष नाग अर्थात हैं लक्ष्मण जी
तो लक्ष्मण जी रावण से प्रश्न करते हैं कि,
क्यों किया राम से बैर तुमने यह बात जानने आया हूं,
जिस कारण वश तुम हारे हो वो वजह पूछने आया हूं ।
तो रावण इसका उत्तर देते हुए पहले अपना एक सूक्ष्म परिचय देता है और कहता है,
कि, लंका पे करता राज हूं मैं
सब असुरों का सरताज हूं मैं
ब्राह्मण हूं मैं, सर्व शक्तिमान
हूं मैं सर्वज्ञ, हूं मैं महान्
वे बीस भुजाएं लिए हुए
शंकर को अर्पण दिए हुए
दस शीशों की बुद्धि मुझमें
शिव शंभू की सिद्धि मुझमें
मैं वो होनी जो टले नहीं
हूं वो धारा जो जले नहीं
देवादीदेव का केश हूं मैं
हां हां ! वो ही लंकेश हूं मैं।
अब रावण अपने उत्तर को प्रारंभ करता है ~
मरना था राम के हाथ मुझे
न होगा यह सब ज्ञात तुझे,
कि, माता को हर मैं लाया था
पर छू न उन्हें मैं पाया था,
उस पल से मैं घबराया था
हनुमंत ने लंक जलाया था।
मृत्यु का मुझ पर साया था
जब राम से सेतु बनाया था,
अब नष्ट हो गया अहंकार,
जो मुझमें यूं ही समाया था।
परन्तु लक्ष्मण,
राम ने न यह जीत दिलाई
लक्ष्मण ये जीत तुम्हारी है,
वजह अनुज था मेरा बस
जिस कारण लंका हारी है।
वह तनिक न तेरे जैसा है
तभी हाल ये मेरा ऐसा है,
और हार तो मेरी तय ही थी
जब भाई विभीषण जैसा है।
और अंत में रावण कहता है कि,
हो गया सफल जीवन मेरा
ले चलो प्रभु अब साथ मुझे।
क्यों किया राम से बैर मैने
हो गया न लक्ष्मण ज्ञात तुझे।।
हो गया न लक्ष्मण ज्ञात तुझे।।