सम्भाल कर (पिता)
सम्भाल कर (पिता)
राह तेरी है कठिन बानो की सैया के समा
चाहता तुझको करना विचलित पथ से सर यह जमा
आएंगी उसे राह में विघ्ने आंख मूंद पार कर
संग मैं भी चलता हूं उंगली पकड़ संभाल कर
क्यों हृदय को थामे बैठा राह के तू मोड़ पे
तू अकेला रही मुझको राह में तू जोड़ ले
इस हृदय का शूल क्या है जानकर अनजान कर
संग मैं भी चलता हूं उंगली पकड़ संभाल कर
सिमटा हुआ तू बैठा है इस सुनसान राह में
सनसनी हवा चाले समिट जा आके बाहों में
बिन लड़े तू शांत सा यूं बैठा क्यों है हार कर
संग मैं भी चलता हूं उंगली पकड़ संभाल कर
राह का अंत है निकट रो लेन दे लगा के गले
वह पल होने को है खत्म जो साथ हम दोनों चले
यह आंसू पूछ हंस जरा चेहरे को तू सवार कर
साथ-साथ चल रहा उंगली पकड़ संभाल कर
हर कदम पर संग तेरे चल रहा था मैं अभी
ढूंढता है तू जिसे मंजिल है वो यही कहीं
जाकर जीत ले उसे यह मेरा साया त्याग कर
जीत कर तू लौटना चलना सदा संभाल कर ||
-पार्थ सारथी शुक्ल