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31 Aug 2025 · 1 min read

श्रृंगार

श्रृंगार तुम्हारा मेरे मन दर्पण को भाता है,
ये प्यार का समर्पण है तेरा मुझसे जो नाता है।

तेरा सजना संवरना आभूषण से सुसज्जित श्रृंगार करना,
मुझे याद दिलाता है वह पल अमावस की रात में चांँद सिर्फ तुम थी।

झुकी हुई नजरें तेरे श्रृंगार में चार चांँद लगा देते है इस कदर,
क्यों न कोई बावला हो देख कर तुझे तेरा दीदार करने के लिए।

श्रृंगार करती हूँ उन्हें अपना बनाए रखने के लिए ” बिपिन”,
ताकि उनकी नजरें मुझे देखते ही मुझमें ही ठहर जाए।

रचनाकार
बुद्ध प्रकाश
मौदहा हमीरपुर

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