शांति
अज्ञात मैं चाहता क्या हूँ?, मैं क्या सोचकर सोचना चाहता हूँ।
इल्म है तो बस इतना कि, मैं अनुचित ढर्रे में नहीं फसना चाहता हूँ।
मैं आज भी विचलित होता हूँ , द्वंद के समुद्र में फसता हूँ।
मैं ख़ुद को दुनिया में और दुनिया को खुद में खोजता हूँ।
इसी खोज का परिणाम कि आज मैं तुम्हारे सामने हूँ।
हे प्रकृति तुम कितनी शांत हो,
तुम्हारे आवाज में भी शांति है।
मात्र शांति होना, शांत होने का परिणाम तो नहीं ।
अशांत होना भी, शांत होने का परिणाम तो नहीं ।
शांत होने का परिणाम मात्र एक शांत रहना है।
अशांति का विकल्प मात्र एक शांत रहना है।
अपरिवर्तनीय शांति, शांत होने में सहायक मात्र हैं।
घोर अशांति में भी शांत रहना यही एक विकल्प मात्र हैं।
हर एक कदम शांत होने के और क़रीब लाता हैं।
हर एक कदम ख़ुद को ख़ुद के और क़रीब लाता हैं।
ये मुसाफ़िर इस यात्रा का निरंतर अनुगमन करता हैं।
जहां वह ख़ुद को खो कर ख़ुद को पाता हैं ।
~ यथार्थ