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31 Aug 2025 · 1 min read

दोहा सप्तक. . . . . नजर

दोहा सप्तक. . . . . नजर

नजरें मंडी हो गईं, नजर बनी बाजार ।
नजरों में ही बिक गया, एक जिस्म सौ बार ।।

नजरों से छुपता नहीं,कभी नजर का प्यार ।
उठी नजर इंकार तो, झुकी नजर इकरार ।।

नजरें समझें जो हुए, नजरों से संवाद ।
बिन बोले ही बोलते , नजरों के उन्माद ।।

नजरों को झूठी लगे, नजरों की मनुहार ।
कामुकता से है भरा, नजरों का संसार ।

नजरें ही करने लगी, नजरों से व्यापार ।
नजर पाश में हो गई, नजर बड़ी लाचार ।।

नजरों में सिमटा रहा, नजरों का इसरार ।
अन्तस के उन्माद को, नजर करे साकार ।।

नजर समर्पण से हुआ, नजरों को अहसास ।
नजर मिटाती दूरियाँ, नजर बढ़ाती प्यास ।।

सुशील सरना / 31-8-25

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