प्रीति रागिनी ..
प्रीति रागिनी ..
हमारे और तुम्हारे बीच
कितना मौन है
एक लम्बे अंतराल के बाद
हम एक दूसरे के सम्मुख
किसी अपराध बोध से ग्रसित
नज़रें झुकाए ऐसे खड़े हैं
जैसे
किसी ताल के दो किनारों पर
ख़ामोशियों से जूझती
दो कश्तियाँ
कितने बेबस हैं हम
अपने अहंकार के पिघलते लावे को
आँखों की हदों में
रोक भी नहीं सकते
चलो छोड़ो
तुम
अपने तुम को बह जाने दो
मैं
अपनी मैं को बहा देता हूँ
शायद ये खारा पानी
हमारे मौन को स्वर दे दे
अंतर्मन की गहन कंदराओं में व्याकुल
मौन भावों को
प्रीति रागिनी से झंकृत
बोलते पलों का
घर दे दे
सुशील सरना