सोरठा छन्द
सोरठा छन्द
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बन जाती सैलाब, जो है जीवन दायनी।
बह जाता है आब, लेकर सबको साथ में।।
गलती जल की नाय, हमने ही छेड़ा उसे।
लेते भवन बनाय, मारग उसका रोक कर।।
जीवन सबको देत, प्रकृति हमारी सम्पदा।
यह जीवन हर लेत, अगर कुपित हो जाय तो।।
दोष प्रकृति को देत, गलती को देखत नहीं।
पथ उसका हर लेत, राज प्रगति के नाम पर।।
कुदरत का सब खेल, देती भर-भर थाल है।
सूद सहित है लेत, राज वसूली जब करे।।
कर लो खूब विकास, किसने है रोका हमें।
तोड़ो मत विश्वास, राज प्रकृति ने जो दिया।।
~ राजकुमार पाल (राज) ✍🏻
(स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित)