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31 Aug 2025 · 1 min read

धूप थी बरसात का पर सिलसिला जारी रहा

धूप थी बरसात का पर सिलसिला जारी रहा
दौर-ए-फ़ुर्क़त में भी वसलत का नशा तारी रहा

दिन तो जैसे तैसे ऑफिस में कटा तेरे बिना
रात का वक़्फ़ा मेरे दिल पर बहुत भारी रहा

मांगने वाले हैं वो विश आस्मां को थी खबर
रात भर तारों का देखो टूटना जारी रहा

वक़्त ने करवट बदल ली फ़र्श पर आए मगर
ऐसे गाढ़े वक्त में किरदार मेयारी रहा

भेष धरके साधुओं का जाके जंगल में बसा
कामना मन में रही मन फिर भी संसारी रहा

एक ग़ज़ल क्या छप गई ख़ुद को वो समझे मीर है
हल्दी की इक गांठ ले बंदर भी पंसारी रहा

ख़ार ने गुल की हिफ़ाज़त में गुजारी ज़िंदगी
टूटने का सबब तो निकहत की गद्दारी रहा

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