जिंदा मुझे कर दो...!
मैं हूं घमंडी मैंने भी, एक घमंड कर लिया,
चुन चुनके दोस्तों को, नापसंद कर दिया।
मैं जान गया था मुझको, मारेगा कोई अपना,
यह सोच सोच मैं ज़िंदा, रहना बंद कर दिया।।
मैंने अपने जीवन को, चारोबन्द कर लिया,
हरा सके न कोई मुझे, ये प्रबन्ध कर लिया।
रहूं जिंदा सदा ऐसे ही, थी यह आरजू मेरी,
सोच के ऐसा जीवन से, अनुबंध कर लिया।।
मैं सोचता रहा कोई, अमर तत्व पा ही लूँ,
मेरी मृत्यु हो ना सके, ऐसा सत्य पा ही लूँ।
पर देखा जब इतिहास, तो हार दिख गया,
तो वरदान में अनोखा, यह तत्व पा ही लूँ।।
मै देखा कोई आज तक, ये माँग न सकें,
दुश्मन को दोस्त बनाने की, ठान न सकें।
ध्यान में आया मैं ही, कर लूँ ये चमत्कार,
मुझको अपना दुश्मन, कोई मान न सकें।।
होंगे हितैषी सबके सब, यही वरदान जानेंगे,
न दुश्मन हो तो कौन, दुश्मनी करना ठानेंगे।
जो दुश्मनी हैं करते, बुद्धि उनकी चली जाए,
अच्छा बुरा सब दोस्त, मुझको अपना मानेंगे।।
मैं करता हूँ कविता, मुझें एक कवि कर दो,
मेरी कविता से सबके, जीवन में रस भर दो।
है ख्वाब यही प्रभु इसको, तुम सच कर देना,
आजीवन मेरे कविता से, जिंदा मुझे कर दो।।
©® पाण्डेय चिदानन्द “चिद्रूप”
(सर्वाधिकार सुरक्षित ३०/०८/२०२५)