कुरुक्षेत्र रण के पूर्व
कुरुक्षेत्र (रण के पूर्व)
है शत्रु जाने क्यों तत्पर
अस्त्र शस्त्रों की नोकों पे
न जाने क्यों यूं चाहता वो
रंगना शोणित के झोंको से
एक हुआ उदय वह सूर्य जिससे
एक नया युद्ध आरंभ हुआ
दोनों पक्ष विपरीत दिशा में
कुरुक्षेत्र प्रारंभ हुआ
एक से एक थे वीर धनुर्धर
और अजय महारथी भी थे
अर्जुन को पथ बुलाने वाले
सखा कृष्णा सारथी भी थे
समक्ष हजारों की सेना के
पांच भाई थे खड़े हुए
केशव उनके पक्ष में जो की
उन पांचो संग अड़े हुए
यह युद्ध की जैसे सपना था
वहां कौन पराया अपना था
लड़ने को यूं सब आतुर थे
जय जय कारा बस जपना था
यह जान की भी है युद्ध समक्ष
ब्रह्मांड में सबसे गहरा है
ठहरते दोषी काल को सब
पर काल तनिक न बेहरा है
रोमांच भरे हर एक योद्धा
नेत्रों में लेकर ज्वाल खड़ा
जाने कैसा था वह मंजर
जब सुनसान चौपाल पड़ा
गूंजे अंबर में शंकर असंख्य
शौर्यों को जिसने दर्शाया
उसे गन से दोनों पक्षों ने
न पाकर भी कुछ-कुछ पाया
झलकी की उसे गंज से दहशत यूं
जैसे शोणित की धारा हो
मानो की लगता कालचक्र में
कोई कभी ना हारा हो
यह कहां शुरू और कहां खत्म
यह रण अपने में अनंत था
और काल मनुज का घूम रहा
करने को सबका अंत था
अभी युद्ध नहीं प्रारंभ हुआ
ना जीते ना कोई हारे थे
अंबर में गूंजे एक ध्वनि
लगते वहां जय जयकार थे
विष्णु की जय ब्रह्मा की जय
महाकाल कल निर्माता की
नक्षत्र की देव ब्रह्मांड की जय
जय मनुज दनुज निर्माता की
इस रण की जय कण कण की जय
जय हो सायं और प्रातः की
जंजाल की जय चौपाल की जय
जय जय उस भाग्य विधाता की ||
-पार्थ सारथी शुक्ल