कु पथ से पथ
कु पथ से पथ
शांत सा यूं बैठा क्यों मनुज तू राह छोड़ कर
चला गया तू पथ से क्यों कु पथ को शीश मोड़कर
तू उठ सही औ’ चल जरा सीमाओं को यूं तोड़ कर
लौट आ तू लौट आ कु पथ से पथ को जोड़कर |
शत्रु की ये राह जहां खड़ा तू सीना तान के
लौट आ तू पथ पे अपने अपनी पूरी शान से
क्यों जान कर अंजान कर रहा तू पथ को छोड़ कर
लौट आ तू लौट आ कु पथ से पथ को जोड़कर |
यह काल चक्र है विषम इस काल को तू जानकर
बाधाएं जो विरोध में शत्रु उन्हें तू मान कर
मनुज तू अंत काल का विषम समय को छोड़कर
लौट आ तू लौट आ कु पथ से पथ को जोड़कर |
असीम शक्ति तुझमें जो उस शक्ति से तू वार कर
वो शत्रु, बैरी और काल पे सदा प्रहार कर
जख्म से बहे जो उस लहू की धारा मोड़कर
लौट आ तू लौट आ कु पथ से पथ को जोड़कर ||
-पार्थ सारथी शुक्ल