जिंदगी
एक अनकही दास्ताँ
बनकर यूँ मेरे साथ
चली आई जिंदगी,
कुछ बिताने ये
आनंद के पल
मेरे साथ यूँ
चली आई जिंदगी।
कभी उलझती सी
और कभी सुलझती सी
यूँ नजर में
चली आई जिंदगी,
इक डोर अदृश्य सी
खींचती
झिझकती मुस्काती सी
चली आई जिंदगी।
उधेड़बुन में रहती
अनकही बतियाँ सी कहती
यूँ संग मेरे
चली आई जिंदगी,
पहेली सी बूझती
अहसासों को कुरेदती
अपने साये से ही खेलती
यूँ चली आई जिंदगी।
अब आ ही गई है
तो सुन अ जिंदगी,
हर हालात औ’ ख्यालात से
मजबूत हो जूझ जिंदगी।
सोनू हंस✍✍✍