नमन भरत भूमि को
///नमन भरत भूमि को///
अनंत ब्रह्मांडों के महापुंज में,
अपना सौर मंडल निराला है।
नवग्रह भरा परिसर जिसका,
परिक्रमा रत उपग्रह माला है।।
इन्हीं ग्रहों में धरती माता का,
वैभव और अधिकार अनोखा।
जीवन साकार प्रतिरूप लिए,
जो सकल उपादानों का लेखा।।
भर भर सकल जीवन तत्व दिए,
पंचतत्व ऊर्जा का साम्य यहां।
विकसित हुआ जीवन धरती पर,
ऐसा अनूठा संयोग किसे कहां।।
अनुग्रह चेतना का पसरा निरंतर,
भरा समग्र धरती पर प्रतिफल।
जैव विविधता से भर गई पृथ्वी,
भाग्य प्राप्त माता को अविकल।।
कितने प्रलय विनाश झेलकर,
बीज रूप से भर जाती अवनी।
अदम्य जिजीविषा भरी इसमें,
पुनःअभिदानों से भरती धरणी।।
धरती पर ही एक भूखंड है,
भरत भूमि यह जिसका नाम।
तपधन से पावन धरा इसकी,
कण-कण मंदिर हर ग्राम धाम।।
मानवता की पोषक संचालक,
ज्ञान विज्ञान शौर्य प्रतिपालक।
दानवता की संहारक नित्य ही,
सत्य समदृष्टि शुचि गोपालक।।
यहां ऋषि दृष्टि ने ब्रह्म जाना,
स्वयं आत्म ब्रह्म को पहचाना।
कूट भरी नेतृत्व गुरुता क्षमता,
फैलाया विश्व आलोक सुहाना।।
आत्म विजय और अनुशासन,
प्रकृति शील की लिखी कहानी।
सकल जगत चरणों में झुकता,
ज्ञान प्रेम से सींचा धरा वीरानी।।
महाकाल का चक्र घूम कर ,
कलि काल पर आया।
भारत की महान संस्कृति को,
जिसने बहुत भरमाया।।
पश्चिम से उठे ऐसे बवंडर,
धूल भरे चक्रवाती।
हम में से कुछ ने बेंच दी,
स्वतंत्रता की थाती।।
किंतु भरत वीरों के सम्मुख,
कहां टिकती गुलामी।
इन जंजीरों को तोड़ भारत,
बना स्वयं का स्वामी।।
कुछ मन बिके जनों ने यहां,
फैलाया अपना जंजाल।
इस संस्कृति को नष्ट करने,
बिछाते रहे षड्यंत्र चाल।।
भारत भूमि में छिपी हुई है,
विश्व नेतृत्व की क्षमता।
उन गुलामों को क्या कहें हम,
जिन्हें विदेश की ममता।।
इस विदेशी ममता ने झुकाया,
राष्ट्र गौरव स्वाभिमान।
गोरी चमड़ी के तलवे चाट कर,
समझते पाते वे सम्मान।।
भारत के प्रति किए षडयंत्रों को,
क्या हम समझ गए हैं।
जन-जन से उठी हुंकार यहां पर,
राष्ट्रद्रोही भभक रहे हैं।।
भारत भूमि पर ऐसा कोई,
अब षडयंत्र नहीं चलेगा।
विदेशी पोषकों का अरमान,
यहीं सदल समूल मिटेगा।।
भरत जनों के उच्चतर भाव,
आदर्श और गौरव गान की।
विजय सदा ही लिखी गई ,
भारत संस्कृति के शान की।।
नमन सदा इस भरत भूमि को,
जिसका औदार्य पुण्य झलक रहा।
भू लूंठित होंगे दानवता पोषक,
भारत जननी का यह अलख रहा।।
भारत संस्कृति का अवदान यही,
श्रेय पथ अनुगामी सारा लोक।
सत्य शास्त्र शौर्य सरसै जग में,
विश्व-संसृति रहे सदा अशोक।।
स्वरचित मौलिक रचना
रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)