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30 Aug 2025 · 5 min read

•प्राचीन गणानाथ मंदिर •

•प्राचीन गणानाथ मंदिर •
उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले में, अल्मोड़ा शहर से बागेश्वर शहर को जाने वाले मोटर मार्ग के बीच ताकुला कस्बे से लगभग 5 किलोमीटर दूर घने जंगलों के मध्य, समुद्र तल से 1998 मीटर ऊंचाई पर , एक सुरम्य स्थल पर गुफा के भीतर एक प्राचीन मंदिर स्थापित है। इस मंदिर को गणानाथ मंदिर कहा जाता है अर्थात गणों के नाथ- भगवान शिव। यह मंदिर एक गुफा के भीतर स्थापित है, जहां पर भगवान भोले नाथ के कई शिव लिंग स्थापित हैं जिनमें से कुछ सुन्दर ढंग से हरे पत्थरों से बनाये गये है और कुछ स्वयंभू लिंग भी उपस्थित हैं । गुफा के ऊपर की ओर से घने जंगलों को मध्य से पेड़ों की जड़ों से निरंतर जलधाराएं गिरती रहती हैं विशेष तौर से बरसात में यह जलधाराएं बड़ी मात्रा में झर-झर करते हुए शिवलिंगों के ऊपर गिरती हैं।ऐसा प्रतीत होता है जैसे शिव की जटाओं से पानी झर रहा हो। यह बहुत ही मनोरम दृश्य उत्पन्न करता है। आपको बताते चलें कि सावन माह में इस मंदिर में विशाल शतचंडी पाठ का आयोजन किया जाता है। यह शतचंडी पाठ सतराली एरिया ( अर्थात सात गांव) के निवासियों के साथ ही अगल-बगल के कई ग्राम वासियों द्वारा सामूहिक रूप में विशाल ढंग से सम्पन्न किया जाता है। जिसमें हजारों ग्राम वासियों के साथ ही बाहर से भी हजारों की संख्या में लोग आते हैं । इस अवसर पर आसपास के गांवों के जो लोग शहरों में प्रवास कर रहे हैं वह भी आवश्यक रूप से इस पांच दिवसीय…शतचंडी पाठ में शामिल होने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार यह एक विशाल मेले का रुप धारण कर लेता है। इससे इस प्राचीन गणानाथ मंदिर के महत्व को समझा जा सकता है। मुझे आज से लगभग चालीस बर्ष पूर्व से ही इस मंदिर का समय-समय पर दर्शन करने का सौभाग्य मिलता रहा है, क्योंकि इसी क्षेत्र के एक गांव ‘लोहना’ में मेरा ससुराल है। अतः मुझे भगवान गणानाथ के भी दर्शन हो जाते हैं और कई शतचंडी महायज्ञ में सम्मिलित होता रहा हूं।
लेकिन इससे बड़ी बात यह है इस गुफा में जहां एक ओर भगवान भोलेनाथ गणानाथ के लिंग स्थापित हैं तो दूसरी ओर एक लगभग पांच – साढ़े पांच फीट की विष्णु भगवान की बहुत ही सुंदर नक्काशी की गई हरे पत्थर की मूर्ति भी रखी गई है। इस मूर्ति की नक्काशी को देखकर यह स्पष्ट होता है कि यह नक्काशी उत्तराखंड की नक्काशी नहीं है। इसे निश्चित ही दक्षिण भारत से यहां लाया गया है क्योंकि इसकी नक्काशी व कलाकारी की शैली दक्षिण भारत की प्रतीत होती है। यह ग्रीन कठोर पत्थर पर बनी हुई है इसका तात्पर्य है कि किसी विषम परिस्थितियों में किन्हीं महान लोगों द्वारा इसको यहां लाकर स्थापित कर दिया गया। बहुत पता लगाने पर तथा बुजुर्गों से जानकारी प्राप्त करने पर भी यह ज्ञात नहीं हो सका कि इस सुंदर पत्थर की मूर्ति को कौन लेकर यहां पर आया और कब लेकर आया? ( संलग्न फोटो में देखेंगे तो आपको इसके महत्व समझ में आएगा)। बहुत ही सुंदर ढंग से गढ़ी गई इस प्रतिमा को देखकर मन मोहित हो जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि गुफा के भीतर रखी गई मूर्ति के ऊपर निरंतर जैसा मैंने पहले भी उल्लेख किया है जल गिरता रहता है। लेकिन इस मूर्ति का क्षरण नहीं हुआ है। जैसा मैंने पहले कहा है ,मैं 40 वर्ष पहले भी इस स्थान पर गया था जहां यह मूर्ति रखी थी जिस तरह थी वैसी ही आज भी है। इसका तात्पर्य है कि इस कठोर पत्थर की मूर्ति है पर निरंतर पानी गिरने का भी कोई प्रभाव नहीं है, इसका क्षरण नहीं हुआ है।
अब मैं यहां पर यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि इतने दुर्गम स्थल पर घने जंगलों के मध्य, बनस्थली के बीच, गुफा के भीतर यह सुंदर प्रतिमा जो सालों से जस की तस रखी हुई है। निश्चित ही इसको विधिवत ढंग से सुव्यवस्थित और संरक्षण करने की आवश्यकता है। जैसा कि मुझे बताया गया कि इस मूर्ति का एक ओर का कुछ भाग टूटा हुआ है शायद इसीलिए इस खंडित प्रतिमा का विधिवत प्रतिस्थापन नहीं किया गया है। लोग इसकी पूजा तो करते हैं लेकिन एक विधि-विधान से इसकी पूजा नहीं की जाती है। लेकिन इस प्रतिमा की जो नक्काशी और कलाकारी मनमोह लेती है दूसरा यह भी विस्मयकारी है कि इतनी भारी प्रतिमा कब, कौन और कैसे इस स्थान पर लेकर आया या क्या इसे यहीं पर बनाया गया? यह शोधकर्ताओं का विषय है। मेरा सरकार और संस्थाओं से यह आग्रह की इसको विधिवत ढंग से सुरक्षित रखा जाय ताकि यह सैकड़ों साल तक सुरक्षित रह सके। साथ ही इस स्थल तक जाने के मार्ग को सुगम बनाया जाय ताकि यह एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सके।
मैं यह भी बताते चलूं कि इस गणानाथ मंदिर के ऊपर की ओर लगभग तीन किलोमीटर की ऊंचाई पर पर्वत शिखर है , जिसकी समुद्रतल से ऊंचाई लगभग 2200 मीटर है। इस शिखर पर मल्लिका देवी का मंदिर है (क्या आप जानते हैं मल्लिका देवी किसे कहते हैं और इसके नाम का अर्थ समझते हैं?) इस स्थल से आप 360 डिग्री कोण से पूरे क्षेत्र का नयनाभिराम दर्शन कर सकते हैं। जहां से एक ओर उत्तर में हिमाच्छादित हिमालय श्रृंगों की पूरी श्रृंखला के दर्शन होते हैं तो दूसरी ओर सोमेश्वर घाटी और चंद्र राजाओं की कत्यूर या गरुण घाटी के नयनाभिराम दृश्य दिखाई देते हैं। इस तरह के मल्लिका देवी का मंदिर भी पर्यटन की दृष्टिकोण से बहुत ही सुंदर और मनोरम स्थल है। उत्तराखंड सरकार द्वारा इस गणानाथ को एक पर्यटन स्थल घोषित किया है जिसके शिलापट्ट भी वहां स्थापित किये गये हैं।(फोटो संलग्न) बताया गया कि मंदिर के बीच में जंगल क्षेत्र पड़ने के कारण पक्की रोड नहीं बन पा रही है हालांकि कच्ची रोड है लेकिन बरसात में उस कच्ची सड़क पर अत्यंत खतरनाक है जिस कारण लोगों को बरसात में , विशेष रूप से सावन के महिने में पैदल यात्रा करनी पड़ती है। मैं स्वयं कई बार पैदल यात्रा करके गणानाथ और मल्लिका देवी मंदिर तक पहुंचा हूं। निश्चित ही पैदल यात्रा का अपना अलग रोमांच होता है लेकिन सब के लिए सम्भव नहीं। इस क्षेत्र में घना जंगल होने से जौंक भी लगती हैं।
आवश्यकता है इस पर्यटन स्थलों को और अधिक विकसित करने और आवागमन हेतु अधिक सुगम सड़क मार्ग बनाने की।
– कौस्तुभ आनन्द चंदोला
साहित्यकार एवं पत्रकार।
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