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30 Aug 2025 · 3 min read

बनादास

## अपनी माटी अपना वतन ।
महक रहा है अपना चमन ।। ##

मैं बात कर रहा हूँ अपनी भारत भूमि संस्कृति की जिसकी गोद मे अनेक वीर ,कवि , सन्त ,महात्मा ,ऋषिमुनि और अवतारी पुरूष हुए है ।
अवध की पुण्य सलिला सरयू की शस्य श्यामला पावन भूमि गोण्डा की धरती पर भगवान राम के गोवंश का अमृत मयी दुग्ध पान कर भक्ति के संस्कार में पले रमे जिन मनीषियों ने सगुण साहित्य की राम भक्ति काव्य धारा को अविरल प्रवाहित किया है उनमें गोस्वामी तुलसीदास व बाबा बेनीमाधव दास की परम्परा के प्रतिनिधि संत कवि बनादास का नाम आदर के साथ लिया जाता है।
आज मैं जिनकी चर्चा करने जा रहा हूँ वह भी एक महान सन्त सन् 1821 ई. में एक क्षत्रिय परिवार में जन्में थे । उनका गाँव अशोकपुर जो जिला गोण्डा में पड़ता है । नाम था उनका बनादास उनके पिता श्री गुरूदत्त सिंह थे । वह बचपन से ही तर्क बुद्धि विवेक शील व्यक्ति के धनी थे ।
बनादास जी के दीक्षा गुरु शैव योगी महात्मा लक्ष्मण वन थे ३० वर्ष की अवस्था में आध्यात्म की तलाश में अयोध्या आ गए, जहां सिया वल्लभशरण के सतत् सानिध्य में रहे। सिया वल्लभ शरण को इनका साधना गुरू कहा जाता है।
उनके घर की माली हालत सही नही होने के कारण उन्होंने भिनगा राज्य (बहराइच) की सेना में नौकरी कर ली थी । वह लगभग सात वर्षो तक वहाँ रहे। इसके प्रश्चात घर लौट आये वहाँ रहते अधिक दिन नहीं बीते थे ,कि उनके एकमात्र पुत्र का अकस्मात निधन हो गया। पुत्र के शव के साथ ही सन् 1851 ई. की कार्तिक पूर्णिमा को ये अयोध्या चले गये और सांसारिक वस्तु से मोह भंग हो गया । आरम्भ में दो वर्ष देशाटन करके इन्होंने चौदह वर्षों तक रामघाट पर घास फूस की कुटी बनाकर घोर तप किया। उनके बारे में यह भी प्रचलित है कि उन्होंने ईश्वर साधना कर ईश्वर का साक्षात्कार किया । उन्होंने विक्टोरिया पार्क से संलग्न भूमि पर ‘भवहरण कुंज’ नामक आश्रम बनाया । इसी स्थान पर सन 1892 ई. को इनका साकेतवास हुआ।
उनकी रचनाओं को पढ़कर ऐसा लगता है उनकी भाषा शैली सूफी अंदाज राम भक्ति निर्गुण पंथी रीतिकाल का बेजोड़ संगम नजर आती है । ऐसा माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास जी के बाद रचना शैलियों की विविधता, प्रबन्ध पटुता और काव्य-सौष्ठव के विचार से ये रामभक्ति शाखा के अन्यतम कवि ठहरते है ।

उनकी की रचनाएँ
उनका कविताकाल में 64 ग्रंथों की रचना की थी ।

उनकी तालिका इस प्रकार है-
1- अर्ज़ पत्रिका, 2- राम निरूपण, 3- राम पंचाग, 4- सुरसरि पंचरत्न 5- विवेक मुक्तावली, 6- राम छठा, 7- गरजपत्री, 8- मोहिनी अष्टक, 9- अनुराग विवर्धक रामायण, 10- पहाड़ा, 11- मात्रा मुक्तावली, 12- ककहरा अरिल्ल, 13- ककहरा झूलना, 14- ककहरा कुण्डलियां, 15- ककहरा चौपाई ,16- खंडन खड्ग
17- विक्षेप विनाश, 18- आत्मबोध, 19- नाम मुक्तावली, 20- अनुराग रत्नावली, 21- व्रह संगम, 22- विज्ञान मुक्तावली, 23- तत्वप्रकाश वेदांत, 24- सिद्धांत बोध वेदान्त, 25- शब्दातीत वेदांत, 26- अनिर्वाच्य वेदांत, 27- स्वरूपानन्द वेदांत, 28- अक्षरातीत वेदान्त, 29- अनुभवानन्द वेदान्त, 30- वेदांत पंचांग, 31- ब्रह्मायन वेदांत, 32- ब्रह्मायन तत्व निरुपण, 33- ब्रह्मायन ज्ञान मुक्तावली, 34- ब्रह्मायन विज्ञान छतीसा, 35- ब्रह्मायन शांति सुस्पित, 36- ब्रह्मायन परमात्मा बोध, 37- ब्रह्मायन पराभक्ति परतु, 38- शुद्ध बोधक वेदान्त ब्रह्मायन सार, 39- रकरादि सहस्त्र नाम, 40- मकरादि सहस्त्र नाम, 41- बजरंग विजय, 42- उभयबोधक रामायण, 43- विस्मरण सम्हार, 44- सार शब्दावली, 45- नाम परतु, 46- नाम परतु संग्रह, 47- बीजक, 48- मुक्तावली, 49- गुरु महात्मय, 50- संत सुमिरनी, 51- समस्यावली, 52- समस्या विनोद, 53- झूलन पचीसी, 54- शिव सुमिरनी, 55- हनुमंत विजय , 56- रोग पराजय, 57- गजेंद्र पंचदशी, 58- प्रह्लाद पंचदशी, 59-द्रोपदी पंचदशी, 60- दाम दुलाई, 61- अर्ज़ पत्री (विलुप्त ग्रंथ), 62- मोक्ष मंजरी, 63-सगुन बोधक, 64- वीजक राम गायत्री।

○अब तक इनके लिखे ग्रंथों में से केवल ‘उभय प्रबोधक रामायण’ और ‘विस्मरणसम्हार’ मुद्रित हुए हैं।

निधन
बनादास जी का निधन सन 1892 ई. को हुआ था।

महात्मा बनादास के साहित्य से मिलने वाले लाभ इस प्रकार हैं:

○1 साहित्यिक लाभ उनके साहित्य में उच्चतम साहित्यिक मानक और रचनात्मकता का समावेश है, जो पाठकों को प्रेरित करता है।

○2 आध्यात्मिक लाभ : -उनके लेखन में आध्यात्मिक ज्ञान और जीवन के उद्देश्य की खोज है, जो पाठकों को आत्म-विकास और आंतरिक शांति की दिशा में मार्गदर्शन करता है।

○3 सांस्कृतिक लाभ : -बनादास का साहित्य भारतीय संस्कृति की समृद्धि और विविधता को दर्शाता है, जो पाठकों को अपनी जड़ों से जुड़ने में मदद करता है।

○4 सामाजिक लाभ :- उनके साहित्य में सामाजिक संदेश और मूल्यों का प्रचार है, जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद कर सकता है।

इन लाभों के माध्यम से, महात्मा बनादास का साहित्य पाठकों के जीवन को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
डॉ अमित कुमार बिजनौरी
कदराबाद खुर्द स्योहारा
बिजनौर उत्तर प्रदेश

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