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30 Aug 2025 · 1 min read

ग़ज़ल 2122 1122 1122 22

ग़ज़ल 2122 1122 1122 22

इश्क़ के दरिया के हालात ने रोने न दिया,
रोती कश्ती के जज़्बात ने रोने न दिया।

हम पहाड़ों की सफाई में रहे व्यस्त सदा,
धरती के लोगों के उत्पात ने रोने न दिया।

मैं चराग़ों के न जलने से परेशां तो था,
पर हवाओं की ख़ुराफ़ात ने रोने न दिया।

दानी के प्रांत में गो मज़हबी झगड़े हुए पर,
बदगुमां दर्द-ए-गुजरात ने रोने न दिया।

ग़ैरों के ज़ुल्म से कुछ आंसू बहे आंखों से ,
मुझको पर अपनों के आघात ने रोने न दिया।

बेवफ़ाई का गिला मुझको ना हो ना हो तुम्हें,
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया।

भाई सरहद की हिफ़ाज़त में हुआ कुर्बां तो,
फिर शहीदों के करामात ने रोने न दिया।

( डॉ संजय दानी दुर्ग-सर्वाधिकार सुरक्षित )

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