ग़ज़ल 2122 1122 1122 22
ग़ज़ल 2122 1122 1122 22
इश्क़ के दरिया के हालात ने रोने न दिया,
रोती कश्ती के जज़्बात ने रोने न दिया।
हम पहाड़ों की सफाई में रहे व्यस्त सदा,
धरती के लोगों के उत्पात ने रोने न दिया।
मैं चराग़ों के न जलने से परेशां तो था,
पर हवाओं की ख़ुराफ़ात ने रोने न दिया।
दानी के प्रांत में गो मज़हबी झगड़े हुए पर,
बदगुमां दर्द-ए-गुजरात ने रोने न दिया।
ग़ैरों के ज़ुल्म से कुछ आंसू बहे आंखों से ,
मुझको पर अपनों के आघात ने रोने न दिया।
बेवफ़ाई का गिला मुझको ना हो ना हो तुम्हें,
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया।
भाई सरहद की हिफ़ाज़त में हुआ कुर्बां तो,
फिर शहीदों के करामात ने रोने न दिया।
( डॉ संजय दानी दुर्ग-सर्वाधिकार सुरक्षित )