किए सैकड़ों बार का, होता है फल गौन।
किए सैकड़ों बार का, होता है फल गौन।
चाह रहे हैं आज भी, रखना हरपल मौन।।
अपने कर्मों का सदा, दिखलाते हैं धौंस।
औरों को हैं मानते, तृण समान या औंस।।
अपने पर जैसे उन्हें, रहता सदा गुमान।
वैसे ही हैं दूसरे, रखे न इसका ध्यान।।
मंथन इसपर आजकल, करना भूलें लोग।
अहं भाव को पालना, सबमें आया रोग।।
ईश्वर सबको देखता, रखना है विश्वास।
जिसपर “पाठक” आस रख, करता सदा प्रयास।।
:- राम किशोर पाठक (शिक्षक/कवि)