मित्रता
महा मंत्र है मित्रता, ऐसी इसकी डोर।
खोले से भी ना खुले, लाख लगा लो जोर।
तन मन अपना वार दे, प्रेम हेतु सब भूल,
मैत्री भाव अनूप है, दिखे ओर ना छोर।।
मित्र भाव श्रीराम ने, राज्य दे दिया दान।
लंक विभीषण सौंप दी, रखा मित्रता मान।
विप्र सुदामा रंक था, गया मित्र के पास,
वशीभूत हो मित्रता, मिला उसे सम्मान।।
बनी रहे जो मित्रता, जगत करे उत्थान।
जहाँ बंधुता वास हो, वही समाज महान।
पल में संकट दूर हो, मित्र निभाता साथ’
नहीं भूलना मित्रता, सभी सुखों की खान।।
-गोदाम्बरी नेगी ‘पुण्डरीक’
हरिद्वार (उत्तराखंड)