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30 Jul 2025 · 2 min read

लघुकथा इंतजार

इंतजार

शरीर साथ छोड़े आज दो दिन हो चुके है , लेकिन किसी के इंतजार में मेरा शरीर रेफ्रिजरेटर के अंदर रखा हुआ है , लेकिन आत्मा अभी भी यहीं घुम रही है ।
इसी के साथ मेरी आँखों के आगे मेरे
परिवार का चलचित्र घुम गया । संदीप से शादी के बाद जीवन के पचास साल गुजर रहे थे, इस बीच राहुल हुए ।
यह कैसी विडम्बना है कि एक औरत की ज़िन्दगी इंतजार में ही गुजर जाती है । पहले संदीप के आफिस से आने का इंतजार और फिर राहुल के आने के बाद उसकी शैतानियों के कारण हर क्षण ज़िन्दगी इंतजार में गुजर रही थी । बचपन में राहुल दरवाजे पीछे छिप जाता था , और मैं दूध का गिलास लिए उसका इंतजार करती रहती थी फिर खिलखिलाहट हंसते हुए मेरी गोद में आ कर बैठ जाता था, यही हरकत वह नहलाते समय, खाना खिलाते समय किया करता था , फिर वह स्कूल-कालेज जाने लगा और मैं आने का इंतजार करती रहती । संदीप सेवानिवृत्त हो गये थे और उनकी भी तबीयत खराब रहने लगी ।
समय गुजरता रहा राहुल की आईटी कम्पनी में नौकरी लग गयी, अब उसके आफिस से लौटने का इंतजार करती रहती । राहुल की शादी हो गयी बहू सुनिता भी आईटी कम्पनी में नौकरी करती थी । दोनों का सपना था विदेश में नौकरी करके पैसा कमाना था और दोनों अमेरिका चले गये । अब राहुल और सुनिता के फोन का इंतजार रहता । समय अबाध गति से गुजर रहा था ।
एक दिन मेरी तबीयत कुछ इस तरह की फिर उठ नहीं सकी । राहुल और सुनिता का इंतजार रहा कि एक बार वह मिलने आ जाये।
काम की अधिकता तो कभी छुट्टी नही मिलने के कारण उनका आना नहीं हो पाया , इसी बीमारी के दौरान सुना था कि वहीं राहुल का बेटा संजीव आ गया था , उसके फोटो राहुल भेजता रहता और वीडियो पर उससे बात कराता रहता , बड़ा प्यारा बच्चा है अब इंतजार बहुत भारी पड़ने लगा था ।
मेरी इच्छा थी कि मैं राहुल सुनिता और संजीव से मिल लूं और उनके इंतजार में मेरी आँखे दरवाजे पर टिकी रहती थी । संदीप मुझे बहुत समझाते रहते, वह नहीं पा रहे तो तुम ठीक हो जाओ अपन चलेंगे ।

इंतजार के दौरान ही मेरा देहांत हो गया, राहुल को सूचित किया उसने वहाॅ से आने में तीन चार दिन लगा दिये , याने कि मेरा इंतजार अभी भी जारी है ।
तभी कुछ हलचल सी हुई मुझे सुनाई आया ” राहुल सुनिता संजीव
आ गये ” मेरी बड़ी इच्छा थी एक बार उन्हें देख लूँ लेकिन वह आते ही रिश्तेदारों से मिलने और मेरे अंतिम संस्कार की तैयारी में लग गया ।
खैर ” राम नाम सत्य है ” की आवाज के बाद मेरा श्मशान घाट जाने का इंतजार खत्म हो गया ।
आत्मा अमर है परन्तु शरीर नश्वर है लेकिन विडम्बना है आज इंतजार जीवन का एक अंग बन गया है ।

संतोष श्रीवास्तव

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